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छठ पूजा का इतिहास और महत्त्व

 

महाभारत काल 

कहते हैं महाभारत काल में कुंती को सूर्य उपासना से कर्ण पुत्र के रूप में प्राप्त हुए थे. कर्ण खुद सूर्य के बहुत बड़े भक्त और उपासक थे. वे घंटों जल में खड़े रह सूर्य की पूजा करते और अर्घ देते थे . सूर्य को अर्घ देने की शुरुआत उसी समय हुई. महाभारत काल में ही जब पांडवों का राज-पाट सभी कुछ छिन गया तब द्रौपदी ने सूर्य की उपासना कर उन्हें इस संकट से उबारने की प्रार्थना की थी .

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रामायण काल

रामायण काल में भी प्रभु राम और सीता माता ने लंका विजय के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष के पष्ठी को उपवास कर सूर्य की आराधना की और पुनः सप्तमी तिथि को सूर्योदय के वक्त सूर्य उपासना कर पूजा संपन्न की थी.  कहते हैं कि षष्ठी तिथि को सूर्य उपासना होने के कारण इसे षष्ठी पर्व कहा गया, जिसे बाद में छठ , षष्ठी के अपभ्रंश के रूप में कहा जाने लगा. वहीं, यह भी मान्यता है कि छठी देवी, भगवान सूर्य की बहन हैं .

हमारी आस्था का सूचक है पर्व

पौराणिक होने के साथ यह पर्व प्रकृति के प्रति हमारी गहन आस्था का भी सूचक है. कृषि कार्य के प्रति आदर को भी समर्पित है छठ, क्योंकि गेहूं की साफ-सफाई से बने आटे से बने मुख्य प्रसाद ठेकुआ की महत्ता छठ पर्व में अप्रतिम है. छठ में प्रयुक्त होने वाले मौसमी नये फलों का प्रयोग होना और सूप, डलिया कलश, दीपक आदि का मुख्य उपयोग करना इस पर्व के कृषि संबंधित आस्था को दर्शाते हैं .

सामाजिक एकजुटता का प्रतीक

नहाय-खाय से लेकर खरना और दोनों अर्घ के दिन तक मेहमानों की आवाजाही जो नि: संदेह व्रती के घर की रौनक होती है. घाट पर किसी भी व्रती का सूप से अर्घ देना खुशगवार सामाजिक एकजुटता के माहौल की कल्पना का यथार्थ रूप बिहार के इस महापर्व के द्वारा पूरे विश्व के सामने उदाहरणस्वरूप है. हम क्यों न कहें कि बिहार में मन की एकजुटता आज के बिखराव और बाजारवाद के भयानक दौर में भी कायम है !

अपनी माटी से जुड़ने का अहसास कराते हैं गीत

ऋग्वेद, उपनिषद में वर्णित छठ पर्व अपने प्रसिद्ध लोकगीतों के कर्णप्रिय बोलों के द्वारा वातावरण में सात्विकता का अलौकिक माहौल उत्पन्न कर देता है. माटी की गंध लिये इन गीतों को देश-विदेश कहीं भी सुन लेने पर ऐसा महसूस होता है कि आप अपनी मिट्टी, अपने परिजनों के बीच हैं. छठ गीतों में अपनी ओर खींचने की अदभुत शक्ति है और यह साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है. इन गीतों को सुनने पर जो असीम शांति और शक्ति महसूस होती है, वह शब्दों में महज बयान करने में शायद हम अक्षम हैं.

वैज्ञानिक पक्ष 

यह ध्यान देने वाली बात है कि इस पर्व का अपना एक वैज्ञानिक पक्ष भी है . षष्ठी पर्व एक विशेष खगोलीय अवसर के दौरान होता है, जब सूर्य की पराबैंगनी किरणें सबसे ज्यादा मात्रा में पृथ्वी की सतह पर प्रभाव डालती हैं. इनके परिणामों से बचने का उपक्रम है व्रत की तमाम क्रियान्वयन शैली!




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